
विमल कांत
Hindtimes news24x7 मस्तूरी मल्हार/ आज 22 मार्च, विश्व जल दिवस हर साल हम नारा लगाते हैं—”जल ही जीवन है”। लेकिन क्या हम वास्तव में जल की महत्ता को गहराई से समझ रहे हैं? आज की हमारी चर्चा के कुछ कड़वे सच और जरूरी समाधान, जिन्हें हर नागरिक और शासन को समझना होगा:हमारी निजी लापरवाही: बूंद-बूंद की बर्बादी गर्मी के दिनों में हम अक्सर देखते हैं कि लोग पानी के प्रति बेहद लापरवाह हो जाते हैं। हजारों-लाखों लीटर पानी केवल इसलिए बह जाता है क्योंकि कोई एक लोटा पानी के लिए पूरा बोरवेल चालू करके भूल जाता है या नलों को खुला छोड़ देता है। यह विलासिता नहीं, बल्कि भविष्य के साथ खिलवाड़ है। जब धरती का जल स्तर (Water Level) गिर रहा हो, तब ऐसी बर्बादी किसी अपराध से कम नहीं है। किसान बदनाम, पर असल गुनहगार कौन?
अक्सर पानी की बर्बादी के लिए किसानों की पारंपरिक खेती को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। लेकिन सच यह है कि किसान का पानी तो वाष्प बनकर या मिट्टी में रिसकर प्रकृति के चक्र में लौट आता है। असली खतरा उन बड़े उद्योगों और फैक्ट्रियों से है, जो न केवल लाखों लीटर शुद्ध जल का दोहन करते हैं, बल्कि ज़हरीले रसायनों से भरा पानी सीधे हमारी नदियों और नालों में बहा देते हैं।
धान की जगह ‘कम पानी’ वाली फसलों का चुनाव
गर्मी के दिनों में रबी की फसल के रूप में धान लगाना आत्मघाती कदम है। एक एकड़ धान लगभग 40 लाख लीटर पानी सोख लेता है। हमें अब जागरूक होकर मूंगफली, मूंग, उड़द और मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसी फसलों की ओर मुड़ना होगा। ये फसलें न केवल कम पानी में तैयार होती हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ाती हैं।
उद्योगों के लिए सख्त नियम: ZLD और ETP
अब समय आ गया है कि हर फैक्ट्री के लिए ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ (ZLD) और ‘एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’ (ETP) को अनिवार्य बनाया जाए। फैक्ट्रियों से निकलने वाला एक बूंद पानी भी बिना शुद्ध किए प्राकृतिक जल स्रोतों में नहीं मिलना चाहिए। हमारा संकल्प: शुद्ध जल, स्वस्थ जीवन एक जागरूक समाज के नाते हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी: संयम बरतें: जरूरत भर ही पानी निकालें, बोरवेल और नलों का दुरुपयोग रोकें।प्रदूषण रोकें: रसायनों का त्याग कर जैविक खेती अपनाएं ताकि हमारा भू-जल जहरीला न हो।
आवाज उठाएं: जल को प्रदूषित करने वाले उद्योगों के खिलाफ मुखर हों।जहाँ जल शुद्ध और सुरक्षित है, वहीं जीवन समृद्ध है।”
आइए, इस जल दिवस पर संकल्प लें कि हम जल को न केवल बचाएंगे, बल्कि उसे ‘अस्वस्थ’ होने से भी रोकेंगे।
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